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नम्रता के साथ पेश, कहानी

नम्रता के साथ पेश, कहानी



नम्रता के साथ पेश, कहानी जब बात नम्रता और सदाचार एवं अपने शौर्य निष्ठा कर्म वचन मन अथवा जीवन चक्र में आने वाले तमाम पहलू की आती है। तब नेपथ्य का रहस्य उजागर हो ही जाता है जैसे- मैं,आप और।
 जिनके पास इस प्रकार की निधि नहीं है वह इंसान अछूता है। जो जानवरों की गणना में आता है यह सनातन धर्म का मत है, जो हम से पूर्व इस संदर्भ में लिख चुका है।
किंतु हम जानते भी हैं चाहे कोई ज्ञानी हो या अज्ञानी सबको अच्छे बुरे का भान होता है। परंतु कुछ डिठारिपन के लोग असहजता को मूल कर्तव्य समझते हैं। और वह उनका जीवनात्मक कार्य बन जाता है, अर्थात वह बना लेते हैं और उसी को सर्वोपरिय मानते हैं।

 ऐसे मानवों पर किसी नेचुरल संजीवनी का असर नहीं होता है। उनकी ऊर्जा यथार्थ ही चली जाती है। मरणोपरांत चेतन ज्ञान आना राख के समान है जो हवा में विदीर्ण हो जाता है।
 बुद्धि से परे बात यह है की नम्रता में न्यूनता लाने वाले वादी अपवादी दोनों ही अपनी श्रेष्ठता का शिकंजा कसते हैं। सिद्ध करते हैं  की  हम  एक बहुत ही  क्लीन निर्दोष व्यक्ति हैं। लेकिन असमंजसता मुश्किले उन्हें भी उलझन में डालतीं है। और न्यायिकता जानते भी हैं किंतु इग्नोर करना उनका मुख्य स्वभाव हो जाता है।
    व्यक्तित्व के धनी आदमी को दलीलों की आवश्यकता नहीं होती है। वह केवल आत्मविश्वास की नौका का सहारा ही लेता है।
    पग-पग पर न्यूनता करने वाले व्यक्तियों का दलीलों मात्र से अंदाजा व्यक्त किया जाता है।
    जैसे- घटना, घटने वाले के साथ एवं अंजाम देने वाले को पूर्ण मालूम होता है। बेहतर यह है कि रुचि किसी को किसी भी कार्य की हो।
     परंतु नास्तिक को दर्द से दर्दनाक और आस्तिक को खुशी से खुशी में चैन आता है।
    दोनों ही इसे नम्रता समझते हैं साथ ही गर्व भी करते हैं।

      नम्रता के साथ पेश,पुरातन कहानी


    किसी राज्य में एक बहुत ही न्याय प्रिय प्रसिद्ध राजा राज्य करते थे। वह अपनी प्रजा की देखभाल स्वयं किया करते थे। अर्थात उनका कोई विशेष विश्वासपात्र मंत्री नहीं था वह  प्रजा का निरीक्षण  स्वयं करते थे।

    साम-दाम-दंड-भेद  इत्यार्तें सभी नीतियों में वह पारंगत थे और इसका कड़ाई से पालन भी करते थे। वह अपने न्याय के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे।

    एक बार उस राज्य में भारी आपदा ने दस्तक दी। उसी  समय एक  कुमंत्र नाम के व्यक्ति ने  राज्य के लोगों को राजा के प्रति भड़काऊ मंत्रणा देना शुरू कर दिया।

    राजा ने राष्ट्रीय सुरक्षा में बाधा पहुंचाने के आरोप में उसे मृत्यु दंड देने की सजा सुनाई।

    किंतु वह दूसरे राजा की शरण में था जो कि राजा  की  उससे दुश्मनी थी।  राजाने अपनी सूझबूझ से उसे लाने की युक्ति बनाई। राजा ने कहा-  जो व्यक्ति नम्रता के साथ पेश होगा उसे सजा नहीं दी जाएगी।

    "कुमंत्र" जानता था कि राजा का आदेश बहुत ही कठोर है। साथ में यह भी जानता था कि प्रशनात्मक तरीके से काम लिया जाए तो जान बचाई जा सकती है।

     क्योंकि राजा अपने राज दरबार में कभी किसी स्त्री को पेश होने का आदेश नहीं देते थे राज दरबार में स्त्री का आना स्वाभिमान का हनन समझते थे।

    चालाक कुमंत्र की स्त्री का नाम नम्रता था। वह उसी के साथ राजा के दरबार में पेश हुआ।

    राजा उसे देखकर आश्चर्यचकित रह गया उसने उस क्षण जाने किस-किस वेद शास्त्रों और अपने कई न्याय शास्त्रों में कुछ खोजने के लिए कुछ क्षण  अपना मन मस्तिक लगा दिया।
    राजा ने सोच विचार कर कहा "कुमंत्र" एक तो तुम पहले से अपराधी थे। दूसरे तुम अपनी स्त्री को साथ लेकर आए इसलिए तुम्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई जाती है। क्योंकि मेरी मर्यादा का हनन हुआ है इससे साथ लाने की क्या आवश्यकता थी।

    कुमंत्र- हुजूर आप बड़े दयानिधि हैं मैंने आप ही की आज्ञा का पालन किया है। आप ही ने कहा था कि जो नम्रता के साथ पेश होगा उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा। इसलिए मैं अपनी पत्नी नम्रता के साथ पेश हुआ हूं।

    दोस्तों नम्रता एक स्त्री शब्द है। अर्थात मां, प्रकृति हम सभी की मां है सभी मां का सम्मान करते हैं उस मां के सामने ऐसा कुछ भी नहीं है जो उसकी ममता के सामने नम्र न हो जाए।
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